10 September 2015

आसन सिद्धि और आसन का महत्तव

जानिये क्यों जरुरी है आसन सिद्धि और आसन का महत्तव :-

जब भी कोई इन्सान साधना मार्ग पर चल पड़ता है तो उसे कई महत्त्वपूर्ण नियमों ध्यान रखना होता है , जिसमे सबसे पहला है आसन का चुनाव और आसन की सिद्धि। आसन के बिना मंत्र का जाप करना क्यों व्यर्थ है ?आप सभी ने देखा होगा पढ़ा भी है कि जब आकाश से बिजली गिरती है तो उससे बचने घरों में तड़ित चालक लगाये जाते हैं। इन तड़ित चालक का कार्य है कि सम्पूर्ण बिजली को आकर्षित व अवशोषित करके धरती अंदर भेज दें। ये स्थानांतरण आपके घर की सुरक्षा लिए होता है और पृथ्वी विद्युत की सुचालक है। इसलिए हम जब मंत्र बिना आसन करते हैं , वो सब स्थानांतरित हो कर जमीन में समां जाते हैं और उसका फल नहीं प्राप्त होता।


किसी भी भवन की मजबूती के लिए उसका बेस याने की नीव मजबूत होनी चाहिए। आसन साधक के लिए बेस नीँव ही तो है इसलिए उसको सिद्ध कर मज़बूती देते हैं।
ॐ नमः शिवाय।




गुरु गोरख नाथ जी का मंत्र

गुरु  गोरख नाथ जी का मंत्र 


ॐ गुरूजी सत नाम आदेश आदि पुरुष गोरख को 


शिव गोरख आदि है , शिव गोरख अनन्त 


शिव गोरख रटते ही , कटते यम के फंद 


शिव गोरख अविनाशी है , शिव गोरख अलख  


कोटि जनम के ताप को , लेता तुरंत भख 


सतनाम ही गोरख हैं , शिव के ह्रदय राम 


शिव गोरख रटने से , होते पूर्ण काम 


आदि पुरुष गोरख जी हैं , शिव का स्वरूप 


भक्त के पाँय लागते , ग्राम -प्रजा और भूप 


ब्रह्म - ब्रह्म मंत्र भये प्रकाशा , जिसमे शिव गोरख का वासा 


देव निरंजन करे सहाय , शिव गोरख जो रटन लगाये 


शिव गोरख हैं पूर्ण प्रकाश , रटते रहो स्वांस -स्वांस 


सत्य ज्योति है रूप तुम्हारा , सारे जग में तुम्हरा पसारा 


कुण्डली माता योग देवी , साधू -संत नित्य खेवी 


शिव गोरख तुम करो आदेश , जड़ता काटो देओ उपदेश 


सत्य -ज्योति करे सहाये , शिव गोरख जो रटन लगाये 


 शिव गोरख के तेज़ से , काल होता भयभीत 


जनम-मृत्यु के चक्र से , जोगी जाता जीत 


 शिव गोरख आनंद है , सुख- शांति की खान 


काल -चक्र माया का , पूर्व में होता भान 


 शिव गोरख ही तंत्र है , मंत्र और उपचार 


बुरी बला को तुरंत ही , कर देता लाचार 


 शिव गोरख रटने से , रिद्धि -सिद्धि भण्डार 


कुबेर -लक्ष्मी अन्नपूर्णा , करते फिर उपकार 


 शिव गोरख के जाप में , शक्ति बसी अनूप


साधक रटते -रटते ही , धूनी रमाते धुप 


 शिव गोरख की महिमा का, (यहाँ अपना नाम कहें ) करता /करती बखान 


गुरु संत की कृपा से, शब्दों में है जान। 


******गाय के उपले जला कर  .... कभी भी सुबह या जाप एक बार पढ़ें।  
 

अचूक बाण :कालिका माता से क्षमा :

अचूक बाण :कालिका माता से क्षमा :


अगर किसी मानसिक कलह, तनाव या परेशानी से जूझ रहे हैं तो 

शुक्रवार के दिन मां कालिका के मंदिर में जाकर उनसे अपने द्वारा किए

गए सभी जाने-अनजाने पापों की क्षमा मांग लें और फिर कभी कोई बुरा

कार्य नहीं करने का वादा कर लें। ध्यान रहे, वादा निभा सकते हों तो ही 

करें अन्यथा आप मुसीबत में पड़ सकते हैं। यदि आपने ऐसा 5 शुक्रवार

 को कर लिया तो तुरंत ही आपके संकट दूर हो जाएंगे।

11 या 21 शुक्रवार कालिका के मंदिर जाएं और क्षमा मांगते हुए अपनी 

क्षमता अनुसार नारियल, हार-फूल चढ़ाकर प्रसाद बांटें। माता कालिका 

की पूजा लाल कुमकुम, अक्षत, गुड़हल के लाल फूल और लाल वस्त्र या 

चुनरी अर्पित करके भी कर सकते हैं। भोग में हलवे या दूध से बनी 

मिठाइयों को भी चढ़ा सकते हैं।


अगर पूरी श्रद्धा से मां की उपासना की जाए तो आपकी सारी मनोकामनाएं

 पूर्ण हो सकती हैं। अगर मां प्रसन्न हो जाती हैं, तो मां के आशीर्वाद से 

आपका जीवन बहुत ही सुखद हो जाता है।


""""""मंत्र कैसे साधै""""""

"""""""""""""""श्री नरेश नाथ के पोस्ट से लिया गया है """""""""""""""""



***********आदेश आदेश**************

""""""मंत्र कैसे साधै""""""

** मंत्र तंत्र को कैसे साधा जाये तो कुछ जानकारी जो बहुत उपयोगी है की मंत्र तंत्र को नियम अनुसाशन से 
सिध्द किया जावे तो वहाँ जल्द ही सिध्द होते हैं एक बात की मंत्र तंत्र को हम जब साधते हैं पर वह सधते नही 
है क्योंकि जब तक हम आपने आपको नहीं साधेंगे तब तक ये मंत्र तंत्र नहीं साधेंगे ।

100 आदमी मंत्र साधते हैं तो सिर्फ 3 या 4 व्यक्ति ही सफल होते हैं जो नियम का पालन करते हैं 

(१) मंत्र साधने वाले को शुद्ध रहना मदिरा मास झूट दंभ पाखंड और अहंकार इन चीजो से दूर रहना ।

(२) मंत्रो के नियम अनुसाशन भंग ना करे अपने मन के अनुसार ना चले जैसा आपको बताया जाये वैसा ही करे ।

(३) जिस किसी मंत्र को आप साध रहे हो उस मंत्र पे अटल विशवास रखे।।

(४) मंत्र के जप के समय का ध्यान रखे ।

एसे कई नियम है जिसे आप भलीभाती जानते हो बस उनका गंभीरता से पालन करे ।।

मंत्र और तंत्र को सिध्द करने में सहायक जो शक्ति हैं वो ये हैं

* भैरव

*दुर्गा

* हनुमान

* कुल देवता ईष्ट देवता ईष्ट देवी

* और मंत्र के देवता

और जो सबसे बड़ी सहायक शक्ति हैं वो सिर्फ ईष्ट शक्ति होती हैं ईष्ट कृपा कैसे पाई जाये वह भी आपको 
बता दी जायेगी उससे पहले एक मुख्य बात की
गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो गुरौ निष्ठा परं तपः | गुरोः परतरं नास्ति त्रिवारं कथयामि ते |भगवान शिवजी कहते हैं - "गुरु ही देव हैं, गुरु ही धर्म हैं, गुरु में निष्ठा ही परम तप है गुरु से अधिक और कुछ नहीं है

१. यदि हमने अध्यात्मशास्त्र का अभ्यास नहीं किया होता है |

२. यदि हमें सूक्ष्म का ज्ञान नहीं होता |

३. यदि हम भौतिक जगत की वस्तु प्राप्त करने के लिए गुरु ढूंढते हैं |

४. जब स्वयं की साधना का ठोस आधार नहीं होता|

५. जब हम अपनी जीवन की समस्याओं से पीछा छुडाने के हेतु भगोड़ेपन की वृत्ति रख अध्यात्म का आधार 
लेना चाहते हैं |

६. जब हमें गुरु-शास्त्र पर पूर्णश्रद्धा नहीं होती |

७. जैसा शिष्य होता हो, वैसे ही गुरु मिलते हैं, अतःउच्च कोटिके गुरु चाहिए तो अपनी पात्रता बढायें |

८. जब कोई भीड़ देख कर गुरु धारण करने जाते हैं | वास्तविकता यह है कि गुरु को हम धारण नहीं करते, 
अपितु गुरु हमें शिष्य के रूप में स्वीकार करते हैं | यही कुछ ऐसी बाते हैं जिसे आपको आपने जीवन में गहराई 
से उतारनी हैं गुरु ही सर्वोपरी हैं गुरु ही शिव हैं गुरु ही ज्ञान हैं आप जिस मंत्रो को जपते हो उसके रचियता भी
 गुरु के आधीन ही हैं 

अगर हम सोचे की गुरु बिन हम साधना में सफलता पा लेंगे तो यहाँ आपका भरम हैं क्योकि चारो युग में 

जितने भी भगवान ने अवतार लीये हैं उन्होने सर्वप्रथम गुरु की शरण और सानिध्य लिया है।। 

तो इस सनातन परम्परा को हमें भी निभाना चाहिए इसलिये गुरु अवशयक हैं ।

"""""""""""""""नरेश नाथ"""""""""""""""""


गुरु - गोरखनाथ जी का दिव्य शाबर मंत्र

ॐ  गुरूजी  …। 

गोरख जती मछेन्द्र का चेला , शिव के रूप में दिखे अलबेला , कानों  कुण्डल गले में नादी , हाथ त्रिशूल नाथ है आदि , अलख पुरुष को करूँ आदेश  .... 

जनम -जनम के काटो कलेष , भगवा वेश हाथ में खप्पर , भैरव -शिव का चेला।  जहाँ-जहाँ जाऊं  नगर -डगर लगे फिर वहां  मेला  ....  शिव का धुना गोरख तापे 

काल-कंटक थर-थर कांपें  .... मेरी रक्षा करें नवनाथ , राम-दूत हनुमंत ऋद्धि -सिद्धि आँगन विराजे , माई अन्नपूर्णा सुखवंत शब्द साँचा , पिंड कंचा चलो मंत्र 

ईश्वरो वाचा। 


इस मंत्र का नित ११ बार जाप करने से साधना में सफलता के अलावा सभी मनवांछित कार्य भी सफल होते हैं। 

जय शिव-गोरख , ॐ  शिव-गोरख .





श्री सुशील नरोले भाई जी की सहायता से :-


वचन सिद्धी साधना

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जो बोलेगे वह सत्य होगा क्युके वचन सिद्धी एक प्रकार की वाणी सिद्धी 


हि है.13 तारिख से साधना प्रारंभ करना है,माला रुद्राक्ष का हो,आसन 


वस्त्र कोई भी चलेगे परंतु लाल रंग के रहे तो ठिक है,दिशा उत्तर के 


तरफ़ मुख हो जाप के समय.साधना की शुरूवात ग्रहण से करे और उसके

 

बाद रात्री मे 9 बजे के बाद करे.साधना सूर्यग्रहण से चंद्रग्रहण तक करिये


तो यह सिद्धी पूर्ण जीवन काल तक रहेगी.

मंत्र:-
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ll काली काली महाकाली,इंद्र की बेटी ब्रम्हा की साली,तीन सौ पैसठ काम

 श्रीराजा रामचंद्र के,लंका नाशय के मेरी बाचा सिद्ध करके लावे तो सच्ची 

काली महाकाली कहावे,मेरी भक्ति गुरू की शक्ती,फुरो मंत्र ईश्वरीय वाचा

 ll


विधि:-
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एक पान का बिडा सिर्फ सूर्यग्रहण मे महाकाली जी को चढाये बाकी 


दिन नही और साथ मे एक नारियल,चढाइ हुयी सामग्री दूसरे दिन सुबह

निर्जन स्थान पर रखे.मंत्र को 108 बार सिर्फ ग्रहण काल मे 

पढीये,बाकी दिन मंत्र 21 बार पढके एक ग्लास पानी मे 3 फुंक 

लगाकर 16 दिन पिये.यह साधना महत्वपूर्ण है.

आदेश




6 September 2015

कलयुग में अगर इंसान को अगर शक्तिशाली बनना है , प्रभावशाली दिखना है …बहुत बड़ी बात अगर ज्ञानी ही बनना है तो उसका आर्थिक पक्ष बहुत मजबूत होना चाहिए। क्योंकि भूखे पेट ना भाये गोपाला या भूखे पेट हम साधारण इंसान भक्ति नहीं कर सकते .... मुझ जैसे कुछ पागलों को छोड़कर …।

आर्थिक पक्ष तभी मजबूत होता है , जब आवक इतनी हो कि जावक का पता ही ना लगे , ईश्वर की अनुकम्पा से सब पक्ष मजबूत हो जाते हैं। मेरी पर्सनल धर्म -ग्रन्थ में मैंने कुछ ऐसे ही मंत्र मिले जो आप सभी के लिए हैं। सबसे बड़ी बात इन दोनों मंत्र को नित्य पढ़ने के लिए आपका अधिकतम ५ से १० मिनट लगेगा।
१) धन -दायक और समृद्धिदायक माता महालक्ष्मी जी का मंत्र :-
दिशा - पूर्व ,आसन - लाल , जाप - मात्र २१ बार रोज़
ॐ ह्रीं श्रीं धनधान्य करि महाविद्ये अवतार मम गृहे धनधान्यम क्रूरु कुरु ठः ठः स्वाहा।


२) जिंदगी में अगर किसी आर्थिक विपत्ति जैसे धन हानि , व्यापार में नुक्सान , बचपन से ही धन का अभाव …सीधा सा मतलब है , हर प्रकार की आर्थिक विफलता को दूर कर आपको , आपके परिवार को आर्थिक सम्पन्त्ता देने के लिए।


माता अंजलि ( श्री हनुमान जी की माता )के चित्र रोज १०८ बार जाप करें इस मंत्र का :-


ॐ नमो देव भगवते त्रिलोचनम् त्रिपुरम् अंजलि में कल्याणम् कुरु -कुरु स्वाहा।


२५,००० जाप होते ही ये सिद्ध हो जायेगा , चाहे तो जाप संख्या आप बढ़ा सकते हैं , पर कम से कम १०८ या १ माला(मैं इस पोस्ट के साथ माता अंजलि का चित्र दे रहा हूँ चाहे तो कलर प्रिंट निकलवा लें )


इन दोनों को या कोई एक का भी जाप करें अपनी सहूलियत के साथ , ये सोचकर कि बीमारी कब कौन सी दवाई से ठीक हो जाये , मतलब पूर्ण विश्वास के साथ , क्योंकि जो लड़ता है वही जीतता है।

ॐ नमः शिवाय।




5 September 2015


यह मंत्र जो है पति और पत्नी के बीच का मतभेद दूर करता है


ओम् नम: संभवाय च मयो भवाय च नम: I


शंकराय च मयस्कराय च नम: शिवाय च शिवतराय च।।


पति-पत्नी के मतभेद को दूर करने के लिए कुछ लोग मंत्र जाप का भी सहारा लेते हैं। कहते हैं यदि यह जप विधि-विधान से किया जाए तो पति-पत्नी के बीच कभी अनबन नहीं होती साथ ही प्रेम भी बढ़ता है।


अक्ष्यौ नौ मधुसंकाशे अनीकं नौ समंजनम्।

अंत: कृणुष्व मां ह्रदि मन इन्नौ सहासति।।


कब करें जप:


सुबह उठकर स्नान के बाद किसी एकांत जगह आसन बिछा लें और पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठें। सामने मां पार्वती की प्रतिमा या चित्र रखें और श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति करते हुए 21 बार ऊपर लिखे मंत्र का जाप करें।


वैवाहिक सुख की प्राप्ति और अनबन के निवारण के लिए सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर भगवती दुर्गा की प्रतिमा के सामने दीया और अगरबत्ती जलाकर पुष्प अर्पित करें। अब नीचे लिखे मंत्र का 108 बार जाप करें। ज्योतिषी औऱ पंडितों का मानना है कि ऐसा करने से कुल 21 दिनों में ही सुख-शांति का वातारण व्याप्त हो जाएगा I


मंत्र :-


धां धीं धूं धूर्जटे! पत्नी वां वीं वूं वाग्धीश्वरि I


क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि! शांत शीं शूं शुभं कुरू II



चमत्कारी कर्पूर प्रयाेग:--------


आप रात्री मे भाेजन के बाद थाेङा कर्पूर पर थाेङा शुध्द घी २ लाैंग ङालकर

 प्रज्वलित करें एेसा आप नित्य शयन कक्ष मे करें।

 
एेसा नित्य रात्री मे करने से निंद न आने की समस्या- ङरावने सपने 

आना- घर मे वाद विवाद हाेना- पितृ दाेष - घर मे नकारात्मक ऊर्जा काे 

दूर करने मे यह कर्पूर प्रयाेग नित्य करने से लाभ हाेता है किसी प्रकार की 

आकस्मिक आने वाली आपदा से भी हमारी रक्षा करता है आैर भी बहुत

 से लाभ है।


4 September 2015

नव नाथ जाप:-

नव नाथ जाप :- ॐ नमो आदेश गुरूजी को आदेश ! ॐ गुरूजी ॐ कारे 

आदिनाथ , उदयनाथ पार्वती, सत्यनाथ ब्रम्हा , संतोषनाथ विष्णु 

अचल अचम्भेनाथ , गजबेली गजकन्थडि नाथ , ज्ञान पारखी सिद्ध 

चौरंगीनाथ , मायास्वरुपी दादा मत्स्येन्द्रनाथ घटे पिंडे निरंतर सत्य श्री 

शम्भु जति गुरु गोरक्षनाथ जी को आदेश आदेश ! नाथ जी आदेश-

आदेश ! नव नाथ चौरासी सिद्धों को आदेश - आदेश !!




साधन-विधि एवं प्रयोगः


-पूर्णमासी से जप प्रारम्भ करे। जप के पूर्व चावल की नौ ढेरियाँ बनाकर उन पर ९ सुपारियाँ मौली बाँधकर 

नवनाथों के प्रतीक-रुप में रखकर उनका षोडशोपचार-पूजन करे। तब गुरु, गणेश और इष्ट का स्मरण कर 

आह्वान करे। फिर मन्त्र-जप करे। प्रतिदिन नियत समय और निश्चित संख्या में जप करे। ब्रह्मचर्य से रहे,

 अन्य के हाथों का भोजन या अन्य खाद्य-वस्तुएँ ग्रहण न करे। स्वपाकी रहे। इस साधना से नवनाथों की 

कृपा से साधक धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। उनकी कृपा से ऐहिक और 

पारलौकिक-सभी कार्य सिद्ध होते हैं। गुरु गोरक्ष नाथ जी कि कृपा प्राप्त हो जाती है ।


गोरख-गायत्री-जाप:-

“ॐ गुरुजी, सत नमः आदेश। गुरुजी को आदेश। ॐकारे शिव-रुपी, मध्याह्ने हंस-रुपी,

 सन्ध्यायां साधु-रुपी। हंस, परमहंस दो अक्षर। गुरु तो गोरक्ष, काया तो गायत्री। ॐ ब्रह्म,

 सोऽहं शक्ति, शून्य माता, अवगत पिता, विहंगम जात, अभय पन्थ, सूक्ष्म-वेद, असंख्य 

शाखा, अनन्त प्रवर, निरञ्जन गोत्र, त्रिकुटी क्षेत्र, जुगति जोग, जल-स्वरुप रुद्र-वर्ण। सर्व-देव

 ध्यायते। आए श्री शम्भु-जति गुरु गोरखनाथ। ॐ सोऽहं तत्पुरुषाय विद्महे शिव गोरक्षाय

 धीमहि तन्नो गोरक्षः प्रचोदयात्। ॐ इतना गोरख-गायत्री-जाप सम्पूर्ण भया। गंगा गोदावरी

 त्र्यम्बक-क्षेत्र कोलाञ्चल अनुपान शिला पर सिद्धासन बैठ। नव-नाथ, चौरासी सिद्ध, अनन्त-

कोटि-सिद्ध-मध्ये श्री शम्भु-जति गुरु गोरखनाथजी कथ पढ़, जप के सुनाया। सिद्धो गुरुवरो, 

आदेश-आदेश।।” 



साधन-विधि एवं प्रयोगः-

प्रतिदिन गोरखनाथ जी की प्रतिमा का पंचोपचार से पूजनकर २१, २७, ५१ या १०८ जप करें। नित्य जप से 

भगवान् गोरखनाथ की कृपा मिलती है, जिससे साधक और उसका परिवार सदा सुखी रहता है। बाधाएँ स्वतः

 दूर हो जाती है। सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है और अन्त में परम पद प्राप्त होता है I



2 September 2015

कर्ज, ऋण मोचन हेतु ऋणहर्ता गणपति स्तोत्र पाठ के लाभ


जब किसी जातक पर ऋण अर्थात कर्ज की स्थिति बहुत अधिक बढ़ जाये तब किसी शुभ तिथि से महागणपति जी के समक्ष ऋणहर्ता गणपति स्तोत्र का नियमित अपनी श्रद्धा अनुसार 3, 5, 8, 9 , अथवा 11 पाठ 45 दिन नित्य करे | किसी भी प्रकार के कर्ज, ऋण व आर्थिक बाधा से निश्चित मुक्ति मिलेगी | इस पाठ को करने से पूर्व हरे, केसरिया अथवा लाल वस्त्र बिछाकर श्री गणेश जी को स्थापित करे, जैसे हनुमान जी को सिंदूर व चमेली के तेल का चोला अर्पित करते है ठीक उसी प्रकार सिंदूर व चमेली के तेल का चोला श्री गजानन को अर्पित कर अपने बाये हाथ की तरफ देसी घी का दीपक व दाहिने हाथ की तरफ सरसे के तेल या तिल के तेल का दीपक स्थापित करे साथ ही विनायक जी को गुड चने व बेसन का कुछ भोग अवश्य लगाये |

ऋणहर्ता गणपति स्तोत्र 

ध्यान

ॐ सिन्दूर-वर्णं द्वि-भुजं गणेशं लम्बोदरं पद्म-दले निविष्टम्।


     ब्रह्मादि-देवैः परि-सेव्यमानं सिद्धैर्युतं तं प्रणामि देवम्।।



।।मूल-पाठ।।


सृष्ट्यादौ ब्रह्मणा सम्यक् पूजितः फल-सिद्धये।
सदैव पार्वती-पुत्रः ऋण-नाशं करोतु मे।।१


त्रिपुरस्य वधात् पूर्वं शम्भुना सम्यगर्चितः।
सदैव पार्वती-पुत्रः ऋण-नाशं करोतु मे।।२


हिरण्य-कश्यप्वादीनां वधार्थे विष्णुनार्चितः।
सदैव पार्वती-पुत्रः ऋण-नाशं करोतु मे।।३


महिषस्य वधे देव्या गण-नाथः प्रपुजितः।
सदैव पार्वती-पुत्रः ऋण-नाशं करोतु मे।।४


तारकस्य वधात् पूर्वं कुमारेण प्रपूजितः।
सदैव पार्वती-पुत्रः ऋण-नाशं करोतु मे।।५


भास्करेण गणेशो हि पूजितश्छवि-सिद्धये।
सदैव पार्वती-पुत्रः ऋण-नाशं करोतु मे।।६


शशिना कान्ति-वृद्धयर्थं पूजितो गण-नायकः।
सदैव पार्वती-पुत्रः ऋण-नाशं करोतु मे।।७


पालनाय च तपसां विश्वामित्रेण पूजितः।
सदैव पार्वती-पुत्रः ऋण-नाशं करोतु मे।।८


इदं त्वृण-हर-स्तोत्रं तीव्र-दारिद्र्य-नाशनं,
एक-वारं पठेन्नित्यं वर्षमेकं सामहितः।
दारिद्र्यं दारुणं त्यक्त्वा कुबेर-समतां व्रजेत्।।



यदि आप जीवन की परेशानीयों से तंग आ चुके हैं और आपको कोई 

रास्ता दिखाई नही दे रहा है तो इस जन्मास्टमी को ये आठ टोटके

करें,बहुत जल्द लाभ प्राप्त होगा.




तंत्र शास्त्र के अनुसार किसी भी सिध्दी प्राप्ति या मनोकामना पूर्ति के 

लिये चार रात्रियान सर्वश्रेस्ट है! पहली है कालरात्रि (नर्क चतुर्दशी या 

दीपावली) दूसरी है अहोरात्रि (शिवरात्रि) तीसरी है दारुण रात्रि (होली) और 

चौथी है मोहरात्रि(जन्मास्टमी)! मतलब इन दिनो मे किये गये टोटके 

जरुर सफल होते हैं| काफ़ी कोशिशों के बाद भी यदि आमदनी नही बड

रही है या नौकरी मे प्रमोशन नही हो रहा है तो जन्मास्टमी के दिन सात 

कन्यायों को घर बुलाकर खीर या सफेद मिठाई खिलायें| ईसके बाद 

लगातार पांच शुक्रवार तक सात कन्यायों को खीर बाटें|


जन्मास्टमी से शुरू कर यदि सत्ताइस दिन तक लगातार नारियल व 

बादाम कृष्ण मंदिर मे चडाते हैं तो यकीन मानिये सब सुख प्राप्त 

होंगे.सब कार्य बनते चले जायेंगे.


यदि आर्थिक परेशानीयां लगातार चल रही हैं तो जन्मास्टमी के दिन 

सुबह स्नान आदि करने के बाद राधा कृष्ण मंदिर जाकर दर्शन करें व 

पीले फूलों की माला अर्पण करें.


जीवन मे समर्धि प्राप्त करने के लिये जन्मास्टमी के दिन पीले 

चंदन,केसर,और गुलाबजल मिलाकर माथे पर तिलक लगायें.प्रत्येक 

गुरुवार को ऐसा ही करें.निरंतर कर्ज मे फसतें जा रहे हों तो शमसान के 

कुयें या नल से जल लाकर किसी पीपल के वर्क्ष पर चडायें.यह उपाय

 जन्मास्टमी से शुरू करें|फिर नियमित रुप से छह शनिवार यह उपाय

 करेंगे तो आश्चर्यजनक परिणाम देखेंगे|


जन्मास्टमी के दिन श्री कृष्ण को पान का पत्ता भेंट करें और उसके बाद 

इस पत्ते पर रोली से ओं श्रीं ओं मंत्र लिखकर तिजोरी मे रख लें.आपकी 

तिजोरी की बर्कत बडती रहेगी|


चंदन की लकडी पर श्रीं खुदवाकर धन स्थान पर रखें तो धन व्रद्धी व धन

की हर तरह से सुरक्षा होगी|-


काम सफल करने के लिये किसी मंदिर मे दो केले के पौधे लगा दें.बाद मे

 इंकी नियमित देखभाल करें.जब पौधे फल देने लगें तो इंका दान कर

 दें.स्वयं सेवन ना करें|








राशि के हिसाब से पूजा

आप अपनी राशि के हिसाब से पूजा करेंगे तो मिलने वाला फल चोगुना 


हो जाएगा....


मेष राशि: इस राशि का स्वामी मंगल अग्नि तत्व प्रधान ग्रह है। मंगल की शांति के लिए श्रावण मास में प्रत्येक मंगलवार को बिल्व पत्र पर सफेद चंदन से श्रीराम लिखकर शिवलिंग पर अर्पित करें। "ॐ नम: शिवाय" मंत्र का जप करें।


वृष राशि: पृथ्वी तत्व वाली इस राशि का स्वामी शुक्र है। सुख शांति के लिए तुलसी मंजरी और बिल्व पत्र के साथ शिवलिंग पर दूध और चीनी मिश्रित जल चढ़ाएं। शिवपंचाक्षर स्तोत्र का पाठ करें।


मिथुन राशि: वायु प्रधान इस राशि के स्वामी बुध की अनुकूलता के लिए शहद मिश्रित जल से अभिषेक करें। हरा वस्त्र और हरे फल शिव मंदिर में दान करें। ॐ नम: शिवाय मंत्र का जप करें।


कर्क राशि: जल तत्व वाली इस राशि का स्वामी चंद्रमा यदि जन्म कुंडली में अशुभकारक होकर नीच या शत्रुक्षेत्रीय हो तो सोमवार का व्रत करें। कर्पूर मिश्रित जल, दूध, दही, गंगाजल व मिश्री से शिवजी का अभिषेक करें। दूब और बिल्व पत्र चढ़ाएं। ॐ ह्रीं सौं नम: शिवाय मंत्र का जप करें।


सिंह राशि: अग्नि तत्व वाली इस राशि का स्वामी सूर्य नीचगत, शत्रुक्षेत्रीय या अशुभ कारक हो तो मिश्री व जल से अभिषेक करें। बिल्व पत्र के साथ लाल पुष्प चढ़ाएं। आक की माला अर्पित करें। शिवमहिम्न स्तोत्र का पाठ करें।


कन्या राशि: पृथ्वी तत्व वाली इस राशि के स्वामी बुध की अनुकूलता के लिए श्रावण मास में दूध और शहद से शिवलिंग पर अभिषेक करें। पंचामृत से शिवलिंग का स्नान कराएं। बिल्व पत्र चढ़ाए और धतूरा अर्पित करें। रूद्राष्टक का पाठ करें, तो अपयश और आर्थिक हानि से बच सकेंगे।


तुला राशि: वायु प्रधान इस राशि का स्वामी शुक्र है। श्रावण में दही और गन्ने के रस से अभिषेक करें। बिल्व पत्र के साथ तुलसी और हरश्रृंगार की माला चढ़ाएं। शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करें।


वृश्चिक राशि: इस जलीय राशि का स्वामी मंगल है। दूब और बिल्व पत्र शिवलिंग पर गंगाजल के साथ चढ़ाएं। लाल चंदन का तिलक करें। शिवाष्टोत्तरशतनामावली का जप करें।


धनु राशि: अग्नि तत्व वाली इस राशि के स्वामी गुरू की प्रसन्नता के लिए कच्चे दूध में केसर, मिश्री व हल्दी मिलाकर शिवलिंग को स्नान कराएं। हल्दी व केसर से तिलक करें। रूद्र गायत्री "ॐ तत्पुरूषाय विद्महे महादेवाय धीमहि।। तन्नोरूद्र प्रचोदयात्।।" का जप करें। केला, आम, पपीता का दान दें।


मकर राशि: पृथ्वी प्रधान इस राशि के स्वामी शनि की शांति के लिए घी, शहद, दही और बादाम के तेल से अभिषेक करें, नारियल के जल से स्नान कराकर नीलकमल अर्पित करें। लघु (त्रि अक्षरी) मृत्युंजय मंत्र "ॐ जूं स:" का जप करें।


कुंभ राशि: वायु प्रधान इस राशि का स्वामी भी शनि है। इस राशि के जातक तेल से अभिषेक करें, दूब और बिल्व पत्र के साथ शिवलिंग पर जल चढ़ाएं, तो ये शारीरिक कष्ट, धनहानि, पारिवारिक कष्ट, शत्रु भय जैसी बाधाओं से बच सकते हैं। बीमारी या शत्रुभय हो तो महामृत्युंजय मंत्र (संजीवनी विद्या) का जप करें।


मीन राशि: जल तत्व वाली इस राशि के स्वामी गुरू की कृपा के लिए श्रावण मास में कच्चे दूध में हल्दी मिलाकर शिवजी को अर्पित करें। तुलसी मंजरी के साथ बिल्वपत्र, पीले पुष्प और कनेर के पुष्प शिवलिंग पर चढ़ाएं। केसर का तिलक करें। शिव पंचाक्षर मंत्र "ॐ नम: शिवाय" का जप करें।

1 September 2015

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र

समय कम है तो कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें


वर्तमान समय में सभी लोग पर काम का दबाव बना रहता है। ऐसे में 

दुर्गा सप्तशती का संपूर्ण पाठ कर पाना बहुत से लोगों के लिए कठिन हो 

सकता है। इस स्थिति में दुर्गा सप्तशती के संपूर्ण पाठ का फल प्राप्त

करने के लिए एक आसान उपाय का वर्णन दुर्गा सप्तशती में किया गया

है। अगर आप भी सिर्फ 5 मिनट में दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्याय, 

कवच, कीलक, अर्गला, न्यास के पाठ का पुण्य प्राप्त करना चाहते हैं तो 

आपके लिए यह उपाय काफी उपयोगी हो सकता है।




भगवान शिव ने पार्वती से कहा है कि दुर्गा सप्तशती के संपूर्ण पाठ का जो

फल है वह सिर्फ कुंजिकास्तोत्र के पाठ से प्राप्त हो जाता है। कुंजिकास्तोत्र

का मंत्र सिद्ध किया हुआ इसलिए इसे सिद्ध करने की जरूरत नहीं है। जो

साधक संकल्प लेकर इसके मंत्रों का जप करते हुए दुर्गा मां की आराधना

करते हैं मां उनकी इच्छित मनोकामना पूरी करती हैं। इसमें ध्यान रखने

योग्य बात यह है कि कुंजिकास्तोत्र के मंत्रों का जप किसी को नुकसान 

पहुंचाने के लिए नहीं करना चाहिए। किसी को क्षति पहुंचाने के लिए 

कुंजिकास्तोत्र के मंत्र की साधना करने पर साधक का खुद ही अहित होता

 है।



सिद्ध कुंजिका स्तोत्र


शिव उवाच

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् ।

येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः भवेत् ॥1॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् ।

न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥2॥

कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् ।

अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥ 3॥

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।

मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।

पाठमात्रेण संसिद्ध् येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥4॥


अथ मंत्र:-


ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल

 प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।"


॥ इति मंत्रः॥



"नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।


नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिन ॥1॥


नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिन ॥2॥


जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।


ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका॥3॥


क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते।


चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी॥ 4॥


विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिण ॥5॥


धां धीं धू धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।


क्रां क्रीं क्रूं कालिका देविशां शीं शूं मे शुभं कुरु॥6॥


हुं हु हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।


भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥7॥


अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥


पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा॥ 8॥


सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्र सिद्धिं कुरुष्व मे॥


इदं तु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे।


अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥


यस्तु कुंजिकया देविहीनां सप्तशतीं पठेत् ।


न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥


। इतिश्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वती संवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम् ।



साबर मंत्रो को जगाने की विधि

साबर मंत्रो को जगाने की विधि ~


द्वापरयुग में भगवान् श्री कृष्ण की आज्ञा से अर्जुन ने पाशुपत अस्त्र की


 प्राप्ति के लिए भगवान् शिव का तप किया एक दिन भगवान् शिव एक 


शिकारी का भेष बनाकर आये और जब पूजा के बाद अर्जुन ने सुअर पर

 बाण चलाया तो ठीक उसी वक़्त भगवान् शिव ने भी उस सुअर को तीर 


मारा , दोनों में वाद विवाद हो गया और शिकारी रुपी शिव ने अर्जुन से 


कहा , मुझसे युद्ध करो जो युद्ध में जीत जायेगा सुअर उसी को दीया

 जायेगा अर्जुन और भगवान् शिव में युद्ध शुरू हुआ , युद्ध देखने के लिए

 माँ पार्वती भी शिकारी का भेष बना वहां आ गयी और युद्ध देखने लगी


 तभी भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से कहा जिसका रोज तप करते हो वही


 शिकारी के भेष में साक्षात् खड़े है अर्जुन ने भगवान् शिव के चरणों में

 गिरकर प्रार्थना की और भगवान् शिव ने अर्जुन को अपना असली स्वरुप


 दिखाया !



अर्जुन भगवान् शिव के चरणों में गिर पड़े और पाशुपत अस्त्र के लिए 

प्रार्थना की शिव ने अर्जुन को इच्छित वर दीया , उसी समय माँ पार्वती ने 

भी अपना असली स्वरुप दिखाया जब शिव और अर्जुन में युद्ध हो रहा था 

तो माँ भगवती शिकारी का भेष बनाकर बैठी थी और उस समय अन्य 

शिकारी जो वहाँ युद्ध देख रहे थे उन्होंने जो मॉस का भोजन किया वही

 भोजन माँ भगवती को शिकारी समझ कर खाने को दिया माता ने वही

 भोजन ग्रहण किया इसलिए जब माँ भगवती अपने असली रूप में आई 

तो उन्होंने ने भी शिकारीओं से प्रसन्न होकर कहा ” हे किरातों मैं प्रसन्न

 हूँ , वर मांगो ” इसपर शिकारीओं ने कहा ” हे माँ हम भाषा व्याकरण 

नहीं जानते और ना ही हमे संस्कृत का ज्ञान है और ना ही हम लम्बे चौड़े

 विधि विधान कर सकते है पर हमारे मन में भी आपकी और महादेव की

 भक्ति करने की इच्छा है , इसलिए यदि आप प्रसन्न है तो भगवान शिव

 से हमे ऐसे मंत्र दिलवा दीजिये जिससे हम सरलता से आप का पूजन कर

 सके I



माँ भगवती की प्रसन्नता देख और भीलों का भक्ति भाव देख कर 

आदिनाथ भगवान् शिव ने साबर मन्त्रों की रचना की यहाँ एक बात

 बताना बहुत आवश्यक है कि नाथ पंथ में भगवान् शिव कोआदिनाथ

 ” कहा जाता है और माता पार्वती को उदयनाथ कहा जाता है भगवान्

 शिव जी ने यह विद्या भीलों को प्रदान की और बाद में यही विद्या दादा

 गुरु मत्स्येन्द्रनाथ को मिली , उन्होंने इस विद्या का बहुत प्रचार प्रसार

 किया और करोड़ो साबर मन्त्रों की रचना की उनके बाद गुरु गोरखनाथ

 जी ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया और नवनाथ एवं चौरासी सिद्धों के 

माध्यम से इस विद्या का बहुत प्रचार हुआ कहा जाता है कि योगी 

कानिफनाथ जी ने पांच करोड़ साबर मन्त्रों की रचना की और वही 

चर्पटनाथ जी ने सोलह करोड़ मन्त्रों की रचना की मान्यता है कि योगी 

जालंधरनाथ जी ने तीस करोड़ साबर मन्त्रों की रचना की इन योगीयो के 

बाद अनन्त कोटि नाथ सिद्धों ने साबर मन्त्रों की रचना की यह साबर 

विद्या नाथ पंथ में गुरु शिष्य परम्परा से आगे बढ़ने लगी , इसलिए 

साबर मंत्र चाहे किसी भी प्रकार का क्यों ना हो उसका सम्बन्ध किसी ना

 किसी नाथ पंथी योगी से अवश्य होता है अतः यह कहना गलत ना होगा

 कि साबर मंत्र नाथ सिद्धों की देन है I